गाजर


गाजर की खेती के लिये ठंडी जलवायु की अवश्यक्ता होती है इसका बीज को अंकुरित होने के लिए 7.5 से 28 डिग्री सेल्सियस तापमान अधिक उपयुक्त होता है। यहा 15-20 डिग्री तापमान पर जड़ों का आकार छोटा होता है परन्तु रंग सर्वोत्तम होता है। गाजर की खेती दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है। बुआई के समय खेत की मिट्टी अच्छी तरह से भुर-भुरी होनी चाहिए। क्यू कि भुर-भुरी मिट्टी मे गाजर की जड़ें अच्छी बनती है। भूमि में पानी का निकास होना भी अतिआवश्यक है।



गाजर के खेती के रोग और उनके निवारण हेतु उपाय:
1. कैरेट यलोज-
यह एक विषाणुजनित रोग है, जिस के कारण पत्तियों का बीच का हिस्सा चितकबरा हो जाता है और पुरानी पत्तियां पीली पड़ कर मुड़ जाती हैं। जड़ें आकार में छोटी रह जाती हैं और उन का स्वाद कड़वा हो जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए 0.02 फीसदी मैलाथियान का छिड़काव करना चाहिए, ताकि इस रोग को फैलाने वाले कीडे़ मर जाएं।



2. सर्कोस्पोरा पर्ण अंगमारी-
इस रोग के लक्षण पत्तियों, तनों व फूल वाले भागों पर दिखाई पड़ते हैं। रोगी पत्तियां मुड़ जाती हैं। पत्तियों की सतह व तनों पर बने दागों का आकार अर्धगोलाकार और धूसर, भूरा या काला होता है। फूल वाले हिस्से बीज बनने से पहले ही सिकुड़ कर बरबाद हो जाते हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए बीज बोते समय थायरम कवकनाशी का उपचार करें। खड़ी फसल में रोग के लक्षण दिखाई देते ही मैंकोजेब 25 किलोग्राम, कापर आक्सीक्लोराइड 3 किलोग्राम या क्लोरोथैलोनिल 3 किलोग्राम का 1000 लीटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें।



3. स्क्लेरोटीनिया विगलन-
इस रोग मे पत्तियों, तनों और डंठलों पर सूखे धब्बे होते हैं। रोगी पत्तियां पीली हो कर झड़ जाती हैं। कभी-कभी पूरा पौधा ही सूख कर बरबाद हो जाता है। फलों पर रोग का लक्षण पहले सूखे दाग के रूप में दिखता है, फिर कवक गूदे में तेजी से बढ़ती है और फल को सड़ा देती है। इस रोग की रोकथाम के लिए फसल लगाने से पहले ही खेत में थायरम 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मिलाना चाहिए। कार्बेंडाजिम 50 डब्ल्यूपी कवकनाशी की 1 किलोग्राम मात्रा का 1000 लीटर पानी में घोल बनाएं और प्रति हेक्टेयर की दर से 15-20 दिनों के भीतर 3-4 बार छिड़काव करें। इसके अलावा अन्य और भी रोग होते है आप अपने सूझबुझ तथा अध्ययन से जानकारी प्राप्त कर सकते है तथा, आपको अन्य रोग और उपाय पता है तो कमेन्ट कीजिये ताकि सारे किसानो का ज्ञान प्राप्त हो सके।
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